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Friday, February 15, 2019

Micropoetry हिंदी

ऐ कलम और न लिख गुलाबी दिल की बातें,
क्रांति की हुंकार लिख,कह गए वो जाते जाते।
सुर्ख हुई बर्फीली चादर पुलवामा की घाटी में,
व्यर्थ न हो लहु मिला जो केसर वाली माटी में ।

- जूही

Monday, October 15, 2018

Micropoetry -urdu-hindi

'उनको' देखा था छुपके दरीचों से
अक्स मुझमें मिश्रियों सा खोता है..

बिछाए बैठी हूँ एहसास गलीचों से
एक आहट से जाने क्या-क्या होता है

जूही

Friday, August 17, 2018

#tributetoatrueleader


जो रहा अरि-कुल का भी प्रिय
उसका ही जीवन सफल हुआ

वो अडिग रहा चट्टानों सम
सत्य चुप होकर भी अटल हुआ

-जूही🙏🏼

Wednesday, July 18, 2018

वे सोशल मीडिया पे आ गए हैं



हुआ क्या हाल है बताऊँ दोस्तों?
फोन रख कहीं भाग जाऊँ दोस्तों ?
लिस्ट में मौसी- मामी छा गए हैं 
घर के बड़े फेसबुक पे आ गए हैं

पहले माँ ख़ुशी जताने जाती थी 
"बिट्टू ने कार ली",बताने जाती थी 
उनका मन ये सुन खट्टा होता था 
कि मुझे पहले से पता होता था

सन्देश लम्बा भड़काऊ आए
बुआ ग्रुप पे तिल ताड़ बनाएं 
घर में प्रयोग होने लगे हैं अनोखे 
दादी सिखाये रोज़ घरेलु नुस्खे

अब काका भेजे है "जीएम" मुझको 
काकी पुरे दस गुलदस्ते मुझको
मामा भेज पुराने वीडियो इतरा गए हैं 
घर के बड़े व्हाट्सएप्प पे आ गए हैं

इमोजी न बुझे, हैं भोले 
कमेंट टुटा-फूटा ये बोले 
बिसरे नामों से मुझे बुलाए 
झूठे सलीके न इनको भाए

शेयर करते तस्वीरें बचपन की 
साथी उनके अकेलेपन की 
स्मार्ट लोग छल से बौरा गए हैं
वे सोशल मीडिया पेआ गए हैं

© जूही गुप्ते

Thursday, July 12, 2018

कहमुकरी-2


सूखी चिकनी है प्रवृत्ति
रूके न पानी, टिके न मिट्टी
चर्म सुंदर, कर्म है मैला
हाँ, मानव ? री प्लास्टिक थैला

© जूही

Wednesday, July 11, 2018

कहमुकरी-1

भोले बोल, सहन परिवर्तन
प्राची है, नित लगती नूतन
अपने जोड़े, संस्कारी बिन्दी
कौन सखि माँ? रे बहन, हिन्दी!

Quote

बहुत बह चुकी है आँखों से स्याही
तुम्हारी बाहों की चुनरी ओढ़नी है

जो तुम्हारा सही हाल बता दे
बस मुझे वो किताब पढ़नी है

- जूही

Tuesday, July 10, 2018

Quote


मुझे बहका देंगी ये तारिफें
काँटो भरा गुलाब दे दो

एहसासों को तलब लगी है
हाथों में अच्छी किताब दे दो

© जूही

Saturday, June 16, 2018

ईद मुबारक




آج میرا کانہاں یہ دیکھ کر مسکرایا
سویّاں بنا کے میں نے, عید کا بھوگ لگایا



         आज मेरा कान्हा ये देख के मुस्कुराया है
       सिव्वयाँ बना के मैंने, ईद का भोग लगाया है


© जूही गुप्ते

Monday, June 11, 2018

सफर





तुम अब भी आते हो
मत याद आया करो
आजकल नहीं करती मैं 
तस्वीरें पोस्ट 
किसी भी वॉल पर 
फिर भी कोई स्टोरी तो है 
या थी? हमारी भी !
अकेले सफर करते हुए 
लम्हा लिबास पहनकर 
सामने आ जाता है 
हाँ नसीहतों की फ़ेहरिस्त 
नहीं भूली मैं 
शॉल ओढ़े ही बैठी हूँ 
सीख गई हूँ, 
खुद का ख्याल रखना
ये ऊँचे-ऊँचे नारियल के पेड़
दौड़े जा रहे हैं 
बादलों को रिझाने को
इनसे जुड़ी हैं कुछ सूखी टहनियाँ 
पुरानी बातें होंगी कहने को 
झुकी इन पत्तियाें के पास 
वीडियो नहीं, लेकिन कैद रहेंगे
ये अकेले रिसते पल भी 
वैसे ही जैसे मैं समेट लेती थी 
तुममें सिमटते हुए
लहरों से कोई इंद्रधनुष
उछल कर बाहर आ जाता था
तुम कहते थे, 'चल, सेल्फी लेते हैं'
मैं रोक लेती थी, कहा था न
नज़ारे सिर्फ हम दोनों के हैं
किसी से साझा नहीं करेंगे 
अगर शब्दों में महसूस न
करा सकूँ, गुदगुदी एहसासों की 
तो मैं स्याही कैसी ?

©जूही गुप्ते


Saturday, April 14, 2018

केशव तेरे भारत को ,फिर शाप चढ़ा है नारी का

क्या मिला महाकथा रच के ?
झूठ पड़ा सटा सच से !
कि घर ने खेली खूनी होली थी
संतप्त हुई ,वो तुझसे ये बोली थी

"लड़े-मरे तेरा कुल भी, घोष  है गांधारी का "
केशव तेरे भारत को , शाप चढ़ा था नारी का

तू था 'तथास्तु' कह आया
सौ दोष भी सह आया
देख कि अब क्या हो रहा
तू चिर-निद्रा में सो रहा ?
उठ ! सुन क्रंदन उस केसर की किलकारी का
केशव तेरे भारत को ,फिर शाप चढ़ा है नारी का

किस धर्म के अंधे भक्त हुए? 
सत्ता-कीचड़ में लिप्त हुए
हाथ उठे या कमल खिले
जनता को सिर्फ छल मिले

पीताम्बर छीटों से सना, दाग  है लाचारी का 
केशव तेरे भारत को ,फिर शाप चढ़ा है नारी का

मूर्खों सी बाते करते हैं
पापी घड़े यूँ भरते हैं
पुण्य मल-सा बह जाता है
शून्य भाव रह जाता है

बाँसुरी-स्वर से भर, आँचल नीरवता की क्यारी का
केशव तेरे भारत को ,फिर शाप चढ़ा है नारी का

एक दूजे पे थूक रहे
हैं खुद का घर फूंक रहे
ये लाल,हरे,नीले हो बिखरते हैं
बन गुंडे, झंडे लहराए फिरते हैं
शांति-गीता पाठ पढ़ा दे, इलाज कर बीमारी का
केशव तेरे भारत को, और शाप चढ़े न नारी का

© जूही गुप्ते

Sunday, March 11, 2018

खर्राटे!!




बात आप तक आ गई है 
होठों पर आते आते
चाहे जुड़े हैं कसमों रस्मों से
ये जन्मों के रिश्ते नाते
सहे नहीं जाते हैं मुझसे
उनके रोज़ रोज़ खर्राटे !!


सख्त कठोर हथौड़े कैसे
पड़ते हो कीलों पे जैसे
या रेस में बिगुल बजने पर
कसी लगाम चाबूक जड़ने पर
जब
हज़ार घोड़े हों दौड़ लगाते
इतने जोशीले होते हैं उनके ये खर्राटे!!


काम की लिस्ट मोटी थी
तय कर ऑफिस से लौटी थी
सुबह उठना है जल्दी
रह गई आँखे मैं मलती
और,
वो सोए जैसे सौ शेर हो गुर्राते
भोर तक लेते रहे चैन के खर्राटे!!


कानों में रुई के फाहे डाले
खुद को नींद के किया हवाले
तकिया दो हिस्सों में बँटा था
बस सपनों का टिकट कटा था
उफ्फ,
ट्रेन के जनरल डब्बों जैसे
धड़धड़ खड़खड़ चलते रहे खर्राटे!!


छुट्टी रविवार की आई थी
ओढ़ी जयपुरी रजाई थी
अच्छे दिन की अँगड़ाई अब ली
मैंने जनता सी करवट बदली
फिर
वो रहे सरकारी-बाबू से सुस्ताते
भरी दुपहरी चलाए वादों के खर्राटे!!


नज़्म मेरी मशहूर हुई
तारीफें थीं भरपूर हुई
खुशी जाहिर की उन्होंने
वो कैसे पीछे रह जाते !!
तो,
गड़-गड़-गड़-गड़ बजे
रात भर नगाड़े से खर्राटे !!
© जूही गुप्ते


Thursday, March 1, 2018

In response to Yahya's "bol na"



बोल ना बोल ना कहकर
बहुत वाहवाही बटोरने लगे हो
पर अकेले सस्केस फीकी है न

मेरी तरह अब कोई तुम्हारी
कामयाबी पर तुरंत मिलने की
जिद करती है क्या?

क्या वो भी Maggi में घी डालकर 
मेरी तरह तुम्हें खिलाती है ?
और तुम उसे भी कहते हो 
मोटी , तू पूरी पागल है | 

और तुम्हारी उदासी !!
देखी जाती है उससे?
क्या वो भी 'शीनचैन' की आवाज में
"donkey ,I love you "
बोलकर हँसाती है ??
तुम्हारे stay away यार कहने पर 
चाबियाँ पटक के कहती है ?
Ok fine कि मैं जा रही हूँ |
:)

और रात के 3 बजे 
तुम्हारे sorry yar,am such a looser
मैसेज पे अकड़ के reply करतीं है ?
its loser, एक ही O होता है !!

नहीं , मैं किसी के spellings 
ठीक नहीं करती 
वो कार चलाते हुए 
एक टक नज़रों से 
नहीं देखता मुझे 
मेरा हाथ पकड़कर 
होठों से छूता भी नहीं 
तुम्हारी तरह 

नहीं train आने तक 
हमारी उँगलियाँ कसी 
हुई रहती है ,
एक दूसरे के हाथों में 
तुम्हारी तरह मेरा bag 
देना भूलता नहीं वो 
:)

मेरे birthday कि रात को 
January की ठंडक में 
"मां , गर्मी है| टहल के आता हूँ "
बोलकर
मुझे हॉस्टल पर विश 
करने नहीं आता वो 

अब मैं रोते रोते 
उसकी शर्ट से नाक 
नहीं पोंछती हूँ 
बेवजह किसी बात पर 
उसके गले लगकर 
सिमटना भी नहीं हुआ मुझसे 

शाम को उसको 
you reached kya?
पूछती नहीं रोज़ 
"तुम्हें exactly कैसे पता होता है 
मैं पहुँच गया "
भी नहीं कहता वो 

हाँ  उसका नाम 100 बार 
whats app पे लिख लिख कर 
नहीं भेजती ऑफिस से 
अपने नाम के आगे तुम्हारा 
नाम लिख के शीशे पे 
मिटा दिया करती हूँ 
नहाने के बाद 
हाँ वही शीशा जहाँ तुमने 
साथ खड़े रहकर कहा था 
You !! Me!! Us!!


और हाँ ,
चुप रहकर मुझे खोने के बाद 
अब बोल रहे हो तो 
ये सवाल -जवाब चलने दो 
सिलसिला कम से कम 
हमें एक रखेगा 
क़यामत के दिन तक 
मैं रिश्ता निभाऊँगी 
तुम videos बनाते रहो 

© Juhi Gupte

Tuesday, January 23, 2018

अमलतास का आँचल





कोटि प्राणियों के बीच
लेखन-पठन का वर
दोपायों को दे बैठी हो
छीन मत लेना किसी दिन
भूले-भटके, अटके, सिफ़र हैं
समय कहाँ स्याही में डूबने का ?
ऑटो -टेक्स्ट पर सब निर्भर हैं 

"चलता है" कि तर्ज़ पर
शब्द- जर्ज़र; अशुद्ध-उच्चार
ट्रेंड में है आजकल
यों न टूटे, वे वीणा के तार
सृजन-साधना नहीं करते अब
हंस सारे पढ़े लिखे जो हैं
कौवे की कक्षा में
चाल-चलन सीख रहे हैं

आज इन ऊँची काँच की
अट्टालिकाओं में  बैठी
मशीन हो चली है
वो अल्हड़  टोली
खौलती थी रीतियों-नीतियों पर
भीतर-बाहर मैंने टटोला
पड़ा हो कहीं नॉन-ब्रांडेड 
सरफरोश-बसंती-चोला
               
पर याद होगा तुमको,
स्कूल की प्रार्थनाओं में
रखकर स्वरूप तुम्हारा
उत्सव और सभाओं में
गीत गाए जाते थे
केसर-भात, पूड़ी -हलवा
घर-घर पकाए जाते थे

शिथिल शहरी तारीखों में
गौण हैं सादे  त्यौहार
वीकेंड पर नहीं आते जो ये
पीली  सरसों कब देखी है,
न्यूनता से लैस सडकों ने   
हे शारदे! ओढ़ा दो कोई  
सद्ज्ञान के गोटे-बूटे वाला
अमलतास का आँचल !!


© जूही गुप्ते




Sunday, January 21, 2018

Micropoetry-21


















एक साल घटा है,पर तीस गुना खुशी बढ़ा दी 
पलों के गुब्बारों को तुमने अपनी साँसे देकर !!


© Juhi Gupte

Sunday, December 17, 2017

काव्य और इतिहास


"मछली जल की", "चाँद कटोरी"
मीठी बोली, थपकी-लोरी
बेफिक्र नींद सुलाने वाला
था काव्य,
बचपन चहकाने वाला


थके प्रश्न को,रुके युद्ध को
मोह के आगे,झुके सिद्ध को
                                      गीता पाठ पढ़ाने वाला                                          
और काव्य,
रश्मिरथ चढ़ जाने वाला


    पाना जिसको राम रतन 
प्रेम-प्यास,बिसरे तन-मन
आर्त स्वर में गाने वाला
है काव्य,
साँवले में समाने वाला


 द्रुत-दामिनी सी इक रानी का
उस मिट्टी का, उस पानी का
शौर्य याद दिलाने वाला
हूँ काव्य,
युग-दीपक जलाने वाला


    प्यारे छूटे,प्याले टूटे  
यहीं कहीं पर बैठे -बैठे
‘मधुशाला’ पहुँचाने वाला
वही काव्य,
‘अग्निपथ’ सजाने  वाला

   लोभराज में निर्मल स्वाद के
होने वाले क्रांति-नाद के  
आज बीज बो जाने वाला
मैं काव्य
'कल',इतिहास कहलाने वाला


© जूही गुप्ते





© Juhi Gupte

Sunday, December 10, 2017

बँटवारा जरूरी है!


नहीं होते अच्छे किस्से 
जिनमें होते हों हिस्से 
खेल जैसे दिन-रातों के
ऐसे कुछ हालातों में 
बंटवारा ज़रुरी है


श्वेत-पुंज संचित हुआ 
जग रंगों से वंचित हुआ 
एक अनेक हो जाना है 
गर इंद्रधनु सजाना है 
तो,बंटवारा ज़रुरी है


कलकल नदी मचलती है 
सिमटती कहीं बिखरती है 
सागर को अपनाना है
हाँ, पहाड़ चीरते जाना है 
बंटवारा ज़रुरी है


रीत जन्म की बेमिसाल 
जुड़ती है इक दिव्य नाल 
ममता का स्पर्श पाना हो 
जननी को माँ कहलाना हो
तो,बंटवारा ज़रुरी है


जीवन के टुकड़े समान 
भूत भविष्य और वर्तमान 
वक्त ही पैमाना है
गूढ़ यही समझाना है
कि, बँटवारा ज़रूरी है


© Juhi Gupte

Friday, December 1, 2017

इस बार















वीर रस की कविता तुम हो 
प्रखर-उज्ज्वला सविता तुम हो 
फिर चली अंत क्यों करने ऐसे ?
शुभ दिन अस्ताचल को जैसे 
शक्ति रूप का कर के श्रृंगार 
रुको,अड़ो,लड़ो इस बार


© Juhi Gupte

Wednesday, November 22, 2017

Micropoetry

           
            















            नमी होती है जरूरी, होनी चाहिए
            कोई दुआ नाकुबूल होनी चाहिए
            कमी अधूरा और परेशान रखती है
            यही इंसान को इंसान रखती है

            ©® Juhi Gupte

Saturday, August 19, 2017

सरहद पार रहती है!!





सुनती है मेरे अज़ीज नगमें
लिखती रूह छूने वाली नज़्में
ख़्वाबों को मेरे आमीन कहती है
सरहद पार आफ़रीन रहती है

तकलीफें साझा कर लेते हैं
लतीफों में हँसी ढूँढ लेते हैं
यहाँ मैं झूझती, वहाँ वो सहती है
सरहद पार भी वही हवा बहती है

हम दोनों के एक से हाल होते हैं
दिलों में वही सवाल होते हैं
वो मुझको अपनी बहन कहती है
सरहद पार मेरी बहन रहती है


© Juhi Gupte