ऐ कलम और न लिख गुलाबी दिल की बातें,
क्रांति की हुंकार लिख,कह गए वो जाते जाते।
सुर्ख हुई बर्फीली चादर पुलवामा की घाटी में,
व्यर्थ न हो लहु मिला जो केसर वाली माटी में ।
- जूही
ऐ कलम और न लिख गुलाबी दिल की बातें,
क्रांति की हुंकार लिख,कह गए वो जाते जाते।
सुर्ख हुई बर्फीली चादर पुलवामा की घाटी में,
व्यर्थ न हो लहु मिला जो केसर वाली माटी में ।
- जूही
'उनको' देखा था छुपके दरीचों से
अक्स मुझमें मिश्रियों सा खोता है..
बिछाए बैठी हूँ एहसास गलीचों से
एक आहट से जाने क्या-क्या होता है
जूही
जो रहा अरि-कुल का भी प्रिय
उसका ही जीवन सफल हुआ
वो अडिग रहा चट्टानों सम
सत्य चुप होकर भी अटल हुआ
-जूही🙏🏼
सूखी चिकनी है प्रवृत्ति
रूके न पानी, टिके न मिट्टी
चर्म सुंदर, कर्म है मैला
हाँ, मानव ? री प्लास्टिक थैला
© जूही
मुझे बहका देंगी ये तारिफें
काँटो भरा गुलाब दे दो
एहसासों को तलब लगी है
हाथों में अच्छी किताब दे दो
© जूही
क्या मिला महाकथा रच के ?
झूठ पड़ा सटा सच से !
कि घर ने खेली खूनी होली थी
संतप्त हुई ,वो तुझसे ये बोली थी
"लड़े-मरे तेरा कुल भी, घोष है गांधारी का "
केशव तेरे भारत को , शाप चढ़ा था नारी का
तू था 'तथास्तु' कह आया
सौ दोष भी सह आया
देख कि अब क्या हो रहा
तू चिर-निद्रा में सो रहा ?
उठ ! सुन क्रंदन उस केसर की किलकारी का
केशव तेरे भारत को ,फिर शाप चढ़ा है नारी का
किस धर्म के अंधे भक्त हुए?
सत्ता-कीचड़ में लिप्त हुए
हाथ उठे या कमल खिले
जनता को सिर्फ छल मिले
पीताम्बर छीटों से सना, दाग है लाचारी का
केशव तेरे भारत को ,फिर शाप चढ़ा है नारी का
मूर्खों सी बाते करते हैं
पापी घड़े यूँ भरते हैं
पुण्य मल-सा बह जाता है
शून्य भाव रह जाता है
बाँसुरी-स्वर से भर, आँचल नीरवता की क्यारी का
केशव तेरे भारत को ,फिर शाप चढ़ा है नारी का
एक दूजे पे थूक रहे
हैं खुद का घर फूंक रहे
ये लाल,हरे,नीले हो बिखरते हैं
बन गुंडे, झंडे लहराए फिरते हैं
शांति-गीता पाठ पढ़ा दे, इलाज कर बीमारी का
केशव तेरे भारत को, और शाप चढ़े न नारी का
© जूही गुप्ते